दिल्ली के शाहगंज इलाके की पुरानी गलियाँ समय के साथ थम-सी गई थीं। धूल-धक्कड़, दीवारों की सीलन और उन पर चिपके सत्तर और अस्सी के दशक के पोस्टरों के नीचे, शहर का इतिहास धड़कता था। इन्हीं गलियों में थी एक — गली नंबर 13।
लोग कहते थे कि उस गली में समय का कोई मतलब नहीं था। वहाँ घड़ी रुक जाती थी, मोबाइल नेटवर्क चला जाता था, और अजीब-सी सरसराहट सुनाई देती थी, मानो कोई गली की छतों से चल रहा हो।
दिल्ली यूनिवर्सिटी का छात्र अविरल मेहरा, जो पुरानी जगहों के रहस्यों और इतिहास में रुचि रखता था, एक दिन अपने हॉस्टल के कमरे में एक गुमनाम खत पाता है। उस पर लिखा था:
"अगर तुम सच्चाई जानना चाहते हो, तो 13वीं गली में आओ। वहाँ एक दरवाज़ा है जो सब कुछ बदल देगा। समय: रात 12:13।"
— "एक पुराना दोस्त"
अविरल हैरान रह गया। न उसे पता था किसने भेजा, न क्यों। लेकिन उसका मन बेचैन हो उठा। यह जगह वही थी जिसके बारे में बचपन में उसने अपने नाना से सुना था — “वो गली जहाँ घड़ी बंद हो जाती है।”
13 जनवरी की रात थी। कोहरा गहराता जा रहा था। अविरल ने जींस की जेब में पेन और नोटबुक रखा, और एक छोटा टॉर्च लेकर निकल पड़ा। उसके कदम जैसे-जैसे गली के करीब पहुँचे, हवा और भी ठंडी होने लगी।
गली नंबर 13 एक तंग गलियारा था, दोनों तरफ पुराने मकान, जिनकी खिड़कियाँ जालीदार थीं और दरवाज़ों पर लोहे के सांकल पड़े थे। लेकिन एक मकान अलग था — अंतिम कोने पर एक लकड़ी का काला दरवाज़ा, जिसके ऊपर नाम की पट्टी तक नहीं थी।
उसने घड़ी देखी — ठीक 12:13।
और तभी उसकी घड़ी रुक गई। मोबाइल का नेटवर्क गायब। पीछे पलटा, तो गली का रास्ता कोहरे में घुल गया था।
अविरल ने दरवाज़ा धीरे से खोला। अंदर गहरा अंधेरा था, लेकिन एक नीली रोशनी धीरे-धीरे फैल रही थी — जैसे कोई प्रकाश उसे बुला रहा हो। कमरे की दीवारें सजी थीं पुरानी तस्वीरों से, लेकिन हर तस्वीर में कुछ न कुछ अजीब था — लोगों की आँखें बंद थीं, छवियाँ धुँधली, और सभी घड़ियाँ 12:13 पर रुकी हुई थीं।
कमरे के बीचों-बीच रखी थी एक पुरानी घड़ी — बड़ी, काँसे की बनी, लेकिन उसकी सुइयाँ उलटी दिशा में घूम रही थीं।
तभी एक कोने से आवाज़ आई, “आख़िर तुम आ ही गए, अविरल।”
अंधेरे से एक बूढ़े आदमी की आकृति उभरी — लंबे बाल, सफेद दाढ़ी और कोट। उसने कहा, “मैं डॉ. अर्नव सेन हूँ। मैं ही वो ‘पुराना दोस्त’ हूँ।”
डॉ. अर्नव ने बताया कि वह एक समय-वैज्ञानिक थे, जिन्होंने 1982 में एक प्रयोग किया था जिससे समय को एक सीमित स्थान में धीमा किया जा सकता था। गली नंबर 13 उनके प्रयोग का केंद्र बनी।
“लेकिन प्रयोग असफल नहीं हुआ,” उन्होंने कहा, “वो अधूरा रह गया। जो लोग उस रात यहाँ थे, वे अब समय के चक्र में फँस चुके हैं — जिनमें मेरी पत्नी और बेटा भी हैं।”
“मैंने तुम्हें इसलिए बुलाया क्योंकि... तुम उनके बेटे हो।”
अविरल स्तब्ध रह गया।
“तुम्हें अनाथालय में छोड़ा गया था क्योंकि तुम्हारी माँ समय की खाई में गिर गई थी। और तुम्हारा पिता... मैं हूँ।”
डॉ. अर्नव ने कमरे की घड़ी की ओर इशारा किया। “यह है काल-घड़ी — इसमें छिपी है एक दरवाज़ा, जो समय की परतों को खोलता है।”
उन्होंने चाबी निकाली और घड़ी को खोल दिया।
भीतर एक और छोटा कमरा था — लेकिन वह कमरे से ज्यादा एक अनुभव था।
अविरल जैसे ही उसमें घुसा, उसका शरीर हल्का महसूस हुआ, और चारों ओर विभिन्न समयकालों के दृश्य उभरने लगे। कहीं लोग शाही पोशाक में थे, कहीं अंग्रेज़ अफसरों के झंडे। और बीच में — एक स्त्री चिल्ला रही थी, “अर्नव! हमें बचाओ!”
“माँ!” अविरल ने चीख़ लगाई।
डॉ. अर्नव ने कहा, “अब तुम्हारे पास दो रास्ते हैं — या तो तुम इस दरवाज़े से अपनी माँ को खोजो और सबकुछ बदल दो... लेकिन इसकी कीमत होगी। समय संतुलन बिगड़ जाएगा। या फिर यहीं रहकर एक रक्षक बनो, और दूसरों को यही गलती करने से बचाओ।”
अविरल की आँखें भर आईं। माँ को खोना उसकी सबसे बड़ी पीड़ा थी। लेकिन समय से खिलवाड़ करना शायद एक नई त्रासदी को जन्म दे सकता था।
उसने गहरी साँस ली और कहा, “मैं रक्षक बनूँगा। लेकिन एक वादा कीजिए — आप कभी फिर से किसी को गुमराह नहीं करेंगे।”
डॉ. अर्नव ने सिर झुकाकर वादा किया।
आज भी गली नंबर 13 की घड़ी 12:13 पर अटकी है।
लेकिन जो लोग उस गली के पास से गुजरते हैं, वे कहते हैं कि उस लकड़ी के दरवाज़े से हल्की रोशनी आती है। और कभी-कभी, एक नौजवान दिखता है — नीली आँखों वाला — जैसे समय को पहरे में लिए हो।
दरवाज़े पर एक नई पट्टी टंगी है:
"अविरल मेहरा — समय का रक्षक"

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