राजस्थान के रेतीले टीलों के बीच बसा एक छोटा-सा गाँव था — धरमपुर। गर्मियों में यहाँ की मिट्टी तपती, और सर्दियों में हवाएँ काँपती थीं। बिजली कभी आती, कभी नहीं। पानी के लिए औरतें मीलों चलतीं, और बच्चे अक्सर खेतों में काम करते या गाय-भैंस चराते।
इसी गाँव में रहता था नरेश, एक दुबला-पतला, साँवला सा लड़का, जिसकी आँखों में कभी न बुझने वाली चमक थी। उसका परिवार बेहद गरीब था। उसके पिता दिनभर खेतों में मजदूरी करते, और माँ सुबह-सुबह उठकर गायों को चारा देती, दूध निकालती और गाँव की चौपाल तक ले जाती।
नरेश का सपना कुछ अलग था। जब बच्चे पतंग उड़ाते या गुल्ली-डंडा खेलते, नरेश मिट्टी पर कोई चीज़ बना रहा होता — कभी पंखे जैसा कुछ, कभी बत्तियाँ, कभी बिजली का छोटा सा मॉडल। गाँव के लोग कहते, "ये लड़का कुछ अलग ही है।" लेकिन ज़्यादातर मज़ाक उड़ाते:
"पढ़-लिखकर करेगा क्या? आखिर लौटकर बैल ही चराने हैं ना?"
पर नरेश का जवाब होता — "मैं कुछ ऐसा करूँगा कि मेरे गाँव को मुझ पर गर्व हो।"
नरेश जब तीसरी कक्षा में था, तो एक दिन गाँव के सरकारी स्कूल में एक विजिटिंग टीचर आईं — सुश्री रेखा दीक्षित। उन्होंने बच्चों से पूछा, "तुम बड़े होकर क्या बनना चाहते हो?"
किसी ने कहा — किसान, किसी ने — डॉक्टर। नरेश खड़ा हुआ और बोला —
"मैं वैज्ञानिक बनना चाहता हूँ। मैं वो चीज़ें बनाना चाहता हूँ जो गाँव की ज़िंदगी आसान कर दे।"
रेखा जी ने ध्यान से उसकी आँखों में देखा। उसमें मासूमियत भी थी, जज़्बा भी।
उस दिन के बाद से रेखा जी उसकी मेंटर बन गईं। उन्होंने उसे पुरानी किताबें दीं, समझाया कि विज्ञान सिर्फ किताबों में नहीं होता, बल्कि आस-पास की चीज़ों में होता है।
एक दिन उन्होंने उसे एक टूटी हुई पतंग दी, जिसके आधे हिस्से फटे हुए थे।
बोलीं — “नरेश, ये पतंग तुझसे बहुत मिलती है। अधूरी है, लेकिन अगर तू चाहे, तो यह भी उड़ सकती है।”
नरेश ने उस पतंग को अपने कमरे की दीवार पर चिपका दिया — यह उसकी प्रेरणा बन गई।
जैसे-जैसे नरेश बड़ा हुआ, संघर्ष भी बड़े हुए। उसके पिता चाहते थे कि वह आठवीं के बाद खेतों में काम करे। लेकिन रेखा जी ने पिता को समझाया, “इस लड़के में आग है। इसे मत बुझाइए।”
पिता ने अनमने मन से इजाज़त दे दी।
नरेश रोज़ 5 किलोमीटर दूर स्कूल जाता। कई बार नंगे पाँव, कई बार तेज़ धूप में। लेकिन वह नहीं रुका। उसके पास किताबें नहीं थीं, तो वह पुरानी किताबों को कॉपी में उतार लेता।
एक बार गाँव की बिजली 15 दिन तक गुल रही। उसके पास स्टडी लैम्प नहीं था, तो वह पास के मंदिर के दीपक की लौ के सहारे पढ़ता रहा।
10वीं की बोर्ड परीक्षा में नरेश ने ज़िले में टॉप किया। पूरे गाँव में ढोल-नगाड़े बजने लगे। अख़बार में उसकी तस्वीर छपी:
"धरमपुर का बेटा बना टॉपर!"
12वीं के बाद नरेश को जयपुर विज्ञान संस्थान में दाख़िला मिल गया। लेकिन अब समस्या थी — रहने, खाने और पढ़ाई का खर्च। उसके पिता के पास पैसे नहीं थे। नरेश ने खुद निर्णय लिया —
"मैं ढाबे में बर्तन माँजूँगा, लेकिन पढ़ाई नहीं छोड़ूँगा।"
वह एक ढाबे पर काम करने लगा। सुबह 6 बजे उठकर काम करता, फिर कॉलेज जाता, शाम को फिर काम करता। रात में दो घंटे पढ़ता और उसी ढाबे के कोने में अख़बार बिछाकर सो जाता।
एक रात एक बुज़ुर्ग ग्राहक आया। नरेश ने बर्तन धोते हुए उसे देखा कि वह विज्ञान की कोई किताब पढ़ रहा था।
नरेश ने साहस कर पूछा —
"आप ये किताब पढ़ रहे हैं? ये मेरी पसंदीदा किताब है — स्टीफ़न हॉकिंग की!"
वह व्यक्ति चौंक गया, "तुम ढाबे पर काम करते हो और हॉकिंग को पढ़ते हो?"
नरेश ने मुस्कराते हुए कहा — "मैं विज्ञान पढ़ता हूँ, बर्तन मेरी मजबूरी है।"
वह व्यक्ति थे — डॉ. विनय मेहता, ISRO में वरिष्ठ वैज्ञानिक। उन्होंने उसी दिन नरेश को अपने पास बुलाया और कहा,
"तुम्हारी भूख मुझे तुम्हारे सपने से ज़्यादा तेज़ लगती है। चलो, अब तुम्हें अपनी उड़ान मिल गई।"
डॉ. मेहता ने नरेश को स्कॉलरशिप दिलवाई, रहने की व्यवस्था की और मार्गदर्शन दिया। अब नरेश की पढ़ाई रफ्तार पकड़ चुकी थी। उसने एक प्रोजेक्ट पर काम शुरू किया —
“सोलर एनर्जी से चलने वाला ग्रामीण जल पंप।”
इसमें उसने ऐसा पंप डिजाइन किया जो दिन में सूरज की रोशनी से पानी निकालता, और रात में उसकी बैटरी से खेतों में सिंचाई करता।
इस परियोजना ने पूरे संस्थान का ध्यान खींचा। अगले साल उसे राष्ट्रीय युवा वैज्ञानिक पुरस्कार मिला।
अख़बार में एक और खबर छपी:
"धरमपुर का बेटा अब देश का गौरव!"
उस साल स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर, प्रधानमंत्री ने नरेश को दिल्ली बुलाया। मंच पर जब उसने भाषण देना शुरू किया, उसकी आवाज़ काँप रही थी। पर उसने अपने पहले वाक्य से ही सबका दिल जीत लिया:
"मैं उस टूटी पतंग की तरह था, जिसे सबने बेकार समझा। लेकिन एक अध्यापिका ने मुझे यकीन दिलाया कि मैं उड़ सकता हूँ। आज मैं उन्हीं के भरोसे के पंखों पर यहाँ तक पहुँचा हूँ।”
मंच पर रेखा जी भी थीं। उनकी आँखों में आँसू थे।
नरेश ने मंच से नीचे उतरकर उन्हें गले लगाया और उनके पैर छुए।
देश-विदेश से प्रस्ताव आए, लेकिन नरेश ने सब ठुकरा दिए। वह अपने गाँव लौटा। उसने एक "विज्ञान केंद्र" शुरू किया, जहाँ गाँव के बच्चों को विज्ञान पढ़ाया जाता, प्रयोग कराए जाते और सपने देखना सिखाया जाता।
वह हर साल बच्चों को एक अधूरी पतंग देता और कहता —
"तुम सब उड़ सकते हो, बस अपने अंदर का विश्वास मत खोना।"
सीख :
"संघर्ष चाहे जितना भी बड़ा हो, अगर आत्मबल, ईमानदारी और मेहनत से किया जाए — तो अधूरी पतंगें भी आसमान छू सकती हैं।"
"किसी की परिस्थितियाँ उसकी उड़ान तय नहीं करतीं, बल्कि उसका नजरिया करता है।"

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