उत्तर भारत के दूर पहाड़ियों के बीच बसा एक सुंदर, शांत और हरे-भरे जंगल के पास एक गाँव था—नाम था शिवपुर । इस गाँव में रहते थे वीरू , एक साधारण लेकिन निहायत ईमानदार लकड़हारा। उनका घर मिट्टी का था, छप्पर से ढँका हुआ। माँ-बाप की मृत्यु के बाद वीरू ने छोटी बहन राधा की जिम्मेदारी अपने कंधों पर ले ली थी। हर दिन सूरज उगने से पहले वीरू अपनी कुल्हाड़ी लेकर जंगल की ओर निकल जाता। दिनभर पेड़ काटता, लकड़ियाँ इकट्ठा करता और शाम को बाज़ार में बेच आता। जो थोड़ा-बहुत कमाई होती, उसी से बहन की पढ़ाई, घर का खर्च और जरूरतें पूरी करता। जीवन आसान नहीं था। वीरू की कुल्हाड़ी बहुत पुरानी हो चली थी—लोहे की, जंग लगी, लेकिन वह उसे अपनी माँ की निशानी मानता था। गाँव वाले अक्सर कहते, "वीरू, नई कुल्हाड़ी ले लो।" लेकिन वह हँसकर जवाब देता, "जब तक यह साथ दे रही है, मुझे और कुछ नहीं चाहिए।" एक दिन वीरू जंगल के उस छोर पर गया, जहाँ एक तेज़ बहाव वाली नदी बहती थी। वहीं एक ऊँचा पेड़ काटते समय अचानक कुल्हाड़ी उसके हाथ से फिसल गई और नदी में जा गिरी। वह नदी बहुत गहरी थी। वीरू के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। वह...
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