बहुत समय पहले, एक घना जंगल था जहाँ हर जीव स्वतंत्र रूप से रहता था, लेकिन डर का साया हर ओर छाया रहता था। इसका कारण था—शेर सम्राट ‘विक्रम’। विक्रम बलवान, तेज, और क्रूर था। उसकी दहाड़ से जंगल थर्राता, और उसकी परछाई से ही हिरण, बंदर और खरगोश काँप उठते। विक्रम ने जंगल में ऐसा कानून बना रखा था कि हर सप्ताह एक जानवर उसे भोजन के लिए स्वयं प्रस्तुत होगा।
कई जानवरों ने विरोध किया, लेकिन जो भी विरोध करता, वह या तो मारा जाता या फिर इतना डरा दिया जाता कि बाकी जीव सबक ले लेते। ऐसे ही भय के साये में वर्षों बीतते गए। लेकिन एक दिन, जंगल में एक नई बकरी आई। उसका नाम था — 'गुड़िया'। वह छोटी थी, पर उसकी आँखों में आत्मविश्वास की चमक थी और दिमाग में चतुराई की परतें।
गुड़िया एक पहाड़ी गाँव से भटक कर इस जंगल में आ गई थी। उसने जल्द ही जंगल की स्थिति समझ ली। वह यह देखकर दुखी हुई कि इतने बड़े जंगल के सारे जानवर एक अकेले शेर से डरे हुए हैं।
एक दिन, शेर की सेवा में एक खरगोश की बारी आई। खरगोश बूढ़ा था और डर से काँप रहा था। तभी गुड़िया ने उससे पूछा, “क्या तुम अपनी जगह मुझे भेज दोगे?”
खरगोश अचंभित हुआ, “तुम? तुम तो बहुत छोटी हो! शेर तुम्हें एक ही झपट्टे में खा जाएगा।”
गुड़िया ने मुस्कराकर कहा, “मैं उससे कुछ कहने की अनुमति माँगूँगी। अगर वह मानेगा तो ठीक, नहीं तो मैं भी भागना जानती हूँ।”
खरगोश राजी हो गया और गुड़िया ने उस दिन शेर के सामने जाने का निश्चय किया।
गुड़िया सीधी शेर के गुफा की ओर गई। शेर, अपने आरामदायक शिला पर बैठा अंगड़ाई ले रहा था। जैसे ही उसने बकरी को देखा, उसकी आँखें चमक उठीं।
“ओह, आज का खाना खुद चलकर आया है?” शेर ने व्यंग्य से कहा।
गुड़िया ने सिर झुकाकर कहा, “सम्राट, मुझे मारने से पहले बस कुछ क्षण दीजिए, मुझे कुछ कहने की अनुमति दें।”
शेर को यह अजीब लगा। उसने झपट्टा नहीं मारा, बल्कि पूछा, “तुम्हें क्या कहना है?”
गुड़िया ने कहा, “आप जंगल के राजा हैं, और राजा को केवल बल से नहीं, बुद्धि से भी चलाना चाहिए। अगर मैं आपको संतुष्ट कर दूँ कि आपके इस ‘एक जानवर प्रतिदिन’ कानून से बेहतर कोई और व्यवस्था हो सकती है, तो क्या आप मेरी जान बख्शेंगे?”
शेर को बात दिलचस्प लगी। उसने कहा, “तुम बोल सकती हो, लेकिन अगर बकवास की, तो सीधे खाऊँगा।”
गुड़िया ने अपनी बात शुरू की: “सम्राट, अगर आप हर दिन एक जानवर खा रहे हैं, तो कुछ महीनों में आपके पास खाने के लिए कोई नहीं बचेगा। तब आप क्या करेंगे? भूख से मरना पड़ेगा। इससे अच्छा यह नहीं होगा कि आप जंगल को स्थायी रूप से चलाएँ? मैं आपको एक सुझाव देती हूँ।”
“कौन-सा सुझाव?” शेर ने गरजते हुए पूछा।
“आप जंगल में टैक्स वसूल करें — हर जानवर से सप्ताह में थोड़ा-थोड़ा भोजन लेंगे। हर कोई योगदान देगा। इससे किसी की जान नहीं जाएगी और आपको भी नियमित भोजन मिलेगा।”
शेर कुछ पल चुप रहा, फिर उसने कहा, “हूँ, यह तो एक योजना हो सकती है, लेकिन तुम क्या चाहती हो बदले में?”
गुड़िया बोली, “मेरी जान, और जंगल का सहयोग।”
शेर ने सोचा, “अगर यह बकरी झूठ बोल रही है, तो मैं कल उसे खा लूँगा। लेकिन अगर यह योजना सफल होती है तो मैं वर्षों तक राजा बना रह सकता हूँ।”
वह मान गया।
गुड़िया ने अगले दिन से योजना लागू करवाई। सभी जानवरों को राहत मिली। हर प्राणी अपने घर से कुछ भोजन जमा करके भेजता, और शेर के पास एक बड़ा गोदाम बनवा दिया गया।
लेकिन कुछ ही सप्ताह में शेर को असुविधा होने लगी। उसे ताज़ा मांस की आदत थी। सब्ज़ियाँ, फल और दूध उसे भाते नहीं थे। उसने गुड़िया को बुलाकर कहा, “मुझे यह सब पसंद नहीं। मुझे फिर से शिकार करना है।”
गुड़िया ने कहा, “अगर आप फिर से शिकार करेंगे, तो जानवर फिर भाग जाएँगे और आपकी सत्ता कमज़ोर हो जाएगी। एक राजा को कभी अपने राज्य के भरोसे को नहीं तोड़ना चाहिए।”
पर शेर का अभिमान जाग गया। उसने गरजते हुए कहा, “मैं राजा हूँ! मैं वही करूँगा जो मुझे ठीक लगे!”
गुड़िया समझ गई कि अब शेर बदलने वाला नहीं। उसने तुरंत जंगल में सभा बुलाई। सभी जानवर इकठ्ठा हुए। गुड़िया ने उन्हें शेर के इरादों के बारे में बताया और कहा, “अब समय आ गया है कि हम सभी मिलकर शेर का मुकाबला करें। अकेले हम कमज़ोर हैं, पर साथ मिलकर हम ताकतवर हैं।”
एक भालू बोला, “लेकिन हम कैसे लड़ेंगे?”
गुड़िया ने योजना बनाई: “शेर को अब भरोसा नहीं। हमें उसकी गुफा को बंद करना होगा। उसके खाने के स्रोत काटने होंगे और उसे अकेला करना होगा।”
जानवरों ने रातों-रात गुफा के बाहर की चट्टानों को गिरा कर रास्ता बंद कर दिया। शेर जागा तो देखा कि वह बाहर नहीं जा सकता। उसने दहाड़ लगाई, पर कोई नहीं आया।
दिन बीते। शेर भूखा रहा। उसकी दहाड़ कमजोर पड़ती गई। गुड़िया हर दिन गुफा के बाहर जाती और कहती, “सम्राट, क्या आप मानते हैं कि बल से अधिक बुद्धि की शक्ति है?”
शेर अब टूट चुका था। उसने कहा, “हाँ बकरी, मैं मानता हूँ। तुमने जो किया, वह एक सच्चे नेता की तरह था। मैं तुम्हारे सामने नतमस्तक हूँ।”
कुछ दिन बाद शेर जंगल छोड़कर चला गया।
अब जंगल में चुनाव हुए। जानवरों ने सर्वसम्मति से गुड़िया को नेता चुना। वह हर जीव की बात सुनती, समस्या हल करती और जंगल को न्याय से चलाती।
गुड़िया की कहानी जंगल में नहीं, बल्कि पहाड़ों, मैदानों, और गाँवों तक फैल गई। बच्चों को सिखाया जाने लगा कि शक्ति केवल शरीर की नहीं होती, असली शक्ति मस्तिष्क की होती है।
गुड़िया ने सिखाया — “जहाँ साहस और चतुराई मिलते हैं, वहाँ असंभव भी संभव बन जाता है।”

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